हाल ए दिल!
हाल ए दिल!
बयां करना चाहा कुछ एहसास लफ्ज़ों के साथ
पर बेवफा दिल आज फिर से साथ नहीं दिया!
करना चाहा बयां हाल ए दिल
पर लफ्ज़ों का सहारा ना मिल पाया।
यूं तो अकेले में हजारों बातें करता है
तेरी यादों के साथ दिन रात खेला करता है
पर आज कुछ बेज़ुबाॅ सा है दिल,
बेवफ़ाई का एहसास फिर से दिखा गया।
ए दिल तू हमसे यूं ना रूठा कर
तन्हाई में हमे यूं ना ज़लील किया कर!
बंद कर तेरी बचकानी हरकत
हमे यूं ना दर्द के समुन्दर में ढकेला कर।
हा मानता हूं! समेटा था तूने हजारों यादें
जिन्हे सोच के तेरी पलकें आज भी नम होती है।
रातों में तू आज भी
उनकी दुनिया में अक्सर खोया करता है।
क्या तूने कभी सोचा उन्हें भी कभी तेरी याद आती है?
ए दिल तू यूं ना तड़पाया कर
रातों में मेरी नींदें यूं ना ले जाया कर।
दर्द हर किसी को होता है
तू अपनी ज़िंदगी में यूं ना ठहर जाया कर।
लेखक:मिलीक अहमद।
(सभी अधिकार लेखक द्वारा आरक्षित है। उचित अनुमति के बिना नकल करना एक अपमानजनक कार्य है)


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